*सरस्वती का ब्याह*

*सरसुती का ब्याह*

– *प्रहलाद कुमार पाण्डेय*

*लखन के घर चहल-पहल थी | घर का मुख्य दरवाजा संकरा और छोटा था** |** उसी में से लोगो की आवाजाही लगी हुई थी | कोई जनवासे में मिठाइयां और अन्य पकवान ले जा रहा था तो कोई बिजली को कोसते हुए जनरेटर चालू करने का आदेश दे रहा था | काम करने वाले कम और काम अढ़ाने वाले ज्यादा थे | जो आदेश देता था, आदेश घूम-फिर करउस तक वापस पहुँच जाता | नात-रिश्तेदारों का आगमन होता, तो लखन एक पल ठहरकर उनके पैर पड़ लेता, या अपने पैर पड़वा लेता | गाँव की किशोरियां सरसुती को सजाने-सँवारने में लगी थी | सरसुती की अम्मा की टेर लगी ही रहती थी | छोटा-बड़ा कोई भी काम हो सरसुती की अम्मा को ही टेरा जाता | इस व्यस्तता में सरसुती पर भी कुछ न कुछ काम आ धमकता |**किसानी करने वाले रिश्तेदार दो रोज पहले ही आ गए थे | नौकरी वाले नातों का आना अभी हो रहा था | जो भी रिश्तेदार आता उसके मन में एक सवाल अवश्य था – ‘रामलला नहीं आये**?**’ कुछ लखन से पूछने की हिम्मत न कर पाते तो किसी और से पूछ लेते | लखन से बड़े जो कुछ नात ये सवाल पूछ लेते तो लखन टालते हुए एक वाक्य में कह देता, “हमने बुलाया ही नहीं” और आगे बढ़ किसी काम में व्यस्त हो जाता |**रामलला लखन के बड़े भाई थे | बरसों पहले बाप द्वारा कब्जियाई चार-छह बीघा सरकारी जमीन थी | उसी जमीन का पट्टा बनवाना था | पटवारी और तहसीलदार को लांच–घूंस देकर पट्टा बन जाता | लेकिन लखन के पास पैसे न थे | जो थोड़े-बहुत थे वही सरसुती के ब्याह के लिए जुटा रखे थे | इधर, रामलला पट्टा तो बनवाना चाहते थे लेकिन पैसा पूरा लगाने को तैयार न थे | कहते, “हिस्सा तो आधा मिलेगा फिर हम पूरा पैसा काहे लगाएँ?”**दोनों का हिस्सा-बँटवारा काफी पहले हो गया था | खेती अलग-अलग थी लेकिन खेत की मेढ़ें अलग न थी | गाहे-बगाहे विवाद हो ही जाता था | जुड़ी हुए जमीनें सम्बन्ध जोड़ने और सम्बन्ध तोड़ने दोनों ही कार्य करती हैं | यों तो रामलला और लखन के बीच अक्सर लड़ाई होती रहती थी, बैर भी होता था लेकिन छः महीने-साल भर से ज्यादा न चलता | बाबा-साहब की पुजाई या माँ-बाप के श्राद्ध में एक दिन के लिए वह बैर
अवश्य टूटता | बैर टूटने के बाद फिर कुछ बखेड़ा बनता और फिर बैर हो जाता | तीन बरस पहले मेढ़ों को लेकर इतना विवाद हुआ कि रामलला के बड़े लड़के और लखन में गुत्थम-गुत्था हो गयी थी | रामलला का लड़का नया खून था | लड़ाई में उसने लखन को गाली के साथ पीट भी दिया था | लखन को भूलता न था | कहते, “जिसे हमने हल जोतना सिखाया, जिसे हमने कंधे में बैठा कर खेतों में चने खबाए, आज वही हम पर पहलवानी
दिखा रहे हैं | हम ताजिंदगी न भूलेंगे |” कुछ लखन का भतीजे से पिटने का दुःख और कुछ पट्टीदारों का लखन के कान भरना, बात यहाँ तक आ पहुंची कि तीन साल से दोनों परिवारों में न सिर्फ बोलचाल बल्कि खान-पान भी बंद हो गया था |* *पिछले रक्षाबंधन में रामलला अपनी बड़ी बहन को लिवा लाये थे | बड़ी बहन लखन के यहाँ भी चली गयी थी | इस बात को लेकर रामलला की पत्नी ने बवाल खड़ा कर दिया था
और अपनी नन्द से झगड़ते हुए बोली थी, “बाई, हम तो आपसे सांची कहते है | आप हमारे लिवावे पर आई हो तो आपको यहीं रहना होगा | जब वे आपको लिवा लायें तो आप भी यहाँ न आना | हम बुरा न मानेगें | आपको बुरा लगे या भला, लेकिन आपका वहां जाना हमें खटकता है |”**सामान्य स्थिति में बैर का पता नहीं चलता लेकिन काज-अवसर, सुख-दुःख के समय बैर की परीक्षा होती है | सरसुती के तिलक में, लखन ने रामलला को न न्यौता, न रामलला गए | आज सरसुती का ब्याह हो रहा था |* *“ बरात आ रही है |” रामलला की पत्नी ने दबी आवाज में कहा**“ खूब आवे, हमसे क्या लेना-देना !” बेपरवाही दिखाते हुए रामलला बोले**“ आओ ! छत से दामाद तो एक झलक दिख ही जायेंगे ” रामलला की पत्नी बोली**“ जब लखन ने नाता तोड़ दिया, तो कैसे दामाद? कैसी बिटिया? ” रामलला बोले**“ आज तोड़ दिया है तो कल जुड़ भी जायेगा लेकिन दमाद ऐसे सजे-धजे फिर देखने को न मिलेगें |” उत्साहित होते हुए रामलला की पत्नी बोली* *“ कसम है बिहारी जू की, इस जनम में न जुड़ेगा हमारा नाता ” गंभीर होते हुए रामलला बोले**बाजों-पटाखों की आवाज आने लगी तो रामलला की पत्नी छत पर चली गई | पत्नी के सामने रामलला बेपरवाही दिखा जरूर रहे थे, पर मन ही मन दामाद को देखने को खुद भी उत्सुक थे | वे मन के भावों को उलटकर चेहरे की भंगिमाएँ बनाने में कुशल थे लेकिन दुखी तो वे भी थे |**मन ही मन आप ही बतिया रहे थे, ‘ऐसी क्या बड़ी बात हो गई कि लखन ने खान-पान तोड़ दिया | न्योता न दिया, कोई बात नहीं | सात जात को बुलौवा भेजा, हमारे यहाँ वह भी न भेजा | भतीजे से बैर रख लेते , मेरे पास एक बार तो आते | लड़के की ऐसी सुटाई करता कि ताजिंदगी न भूलता | लेकिन लखन ने मेरा एक मान न रखा | कहते हैं कि मेरे लड़के को हल चलाना सिखाया | तो क्या मैंने उनके लिए कुछ न किया ? बनारस से चश्मा और तोता क्या गौंटिया लाया था ? मै ही लाकर दिए था | उनका पक्का घर बनवाने में कच्चे-बच्चे सहित कौन लगा था | जैसे सफ़ेद गाय की पूँछ के काले बाल उसकी पहचान बन जाते है वैसे ही मेरे लड़के का एक गुनाह हमारी पहचान बन गया |’**कोठे में गए और खाट में पड़ रहे | ब्याह के विषय में नहीं सोचना चाहते थे |उन्हें उम्मीद थी कि लखन अंतिम क्षण तक उन्हें बुलाएगा जरूर इसलिए पाँव पूजने के लिए बर्तन-कपड़े और जेवर पहले ही बनवा लिए थे | रामलला की बुद्धि ने स्वीकार कर लिया था कि अब उनका लखन से हमेशा के लिए टूट गया है | लेकिन मन न मानता था | आशा का कोई आधार नहीं था लेकिन आशा अपना आधार सृजित कर ही लेती है | बहुत जतन करने पर भी ध्यान दूसरी तरफ न लगता था | बीच-बीच में बाजों की आवाज से उनका ध्यान ब्याह की तरफ चला ही जाता था | बाजों की आवाज न आये इसलिए पंखा चालू करने के लिए उठे तो याद आया की गर्मी लग रही है | पंखा खलिहान में भी उपयोग में लिया जाता था इसलिए खनन-खनन की आवाज के साथ चल पड़ा | अब पंखे की आवाज में बाजों की आवाज न आती थी |* *रामलला पंखा चालू करके ब्याह की कल्पना से पीछा छुड़ाना चाहते थे लेकिन उन्हें क्या पता था कि कल्पना को दबाने पर उसका विस्तार तो उसी तरह होता है जैसे बेरी को काटने पर उसका फैलाव | रामलला कल्पना कर रहे थे, ‘अब बारात आ गई होगी | लखन दामाद को गाड़ी से उतार रहा होगा | मैं वहां होता, तो मैं न उतारता उन्हें ? बड़े होने के नाते मेरा अधिकार होता न ! समधी के पैर धुलाये जा रहे होंगे | और सरस्वती… कैसी सुन्दर लग रही होगी वह ! पूरे गाँव में उससे सुन्दर कौन है भला ! लाल साड़ी में कैसी माता रानी जैसी लग रही होगी | लखन पन्ना से लाया था उसके लिए साड़ी | भला, क्यों न लाये ? एक ही तो बेटी है हम दो भाइयों के बीच | लखन भागशाली है कि उसे कन्यादान का पुन्न मिल रहा है | और एक अभागा मैं हूँ कि बिटिया के पाँव तक पूजने के लाले पड़े है | अभी तो पंगत चल रही होगी | मै होतातो कैसे सारे बारातियों को जल्दी-जल्दी परोसता | अरे, परोसता न सही तो सारे लड़को को बैल की तरह काम पर लगा रखता | अभी सब मटरगस्ती कर रहे होंगे | बिटिया का ब्याह कितना बड़ा काज है ! काज क्या है, यज्ञ है यज्ञ ! लखन दो जोड़ी बैल तो ठीक से संभाल नहीं पाता | श्राद्ध में चार बामन्ह खिलाने में कैसा हलाकान हो गया था | इतनी बड़ी बरात कैसे संभाल रहा होगा ? हो न हो, लखन अभी भी आ जाये |
लखन आ जाये तो मैं झट चल पडूँ | लेकिन लखन के पास इतनी फुर्सत कहाँ कि मुझे बुलौवा देता फिरे ? खुद न बुलावे तो न सही, किसी और से तो बुलौवा भिजवा ही सकता है |’**विचारों में डूबते-उतराते रामलला को नींद न आती थी | ध्यान था कि ब्याह से कहीं हटता न था | वे उठे और पानी पीने को बाहर निकले | पानी पीना तो बहाना था | देखना चाहते थे की पत्नी सोई कि नहीं | देखा तो आँगन में बच्चे और पत्नी पड़े सो रहे थे | दबे क़दमों से छत पर गए | मंडप दिखाई दे रहा था | लौडिसपीकर पर मन्त्रों की ध्वनि आती थी |**सोचने लगे ‘लगता है ये मंत्र तो पांव पूजने के समय बोले जाते है | अहा !कितने भागशाली है वो लोग जो पाँव पूज रहे होंगे | सरसुती के ब्याह के बाद कोई लड़की नहीं है परिवार में | हे भगवान् ! क्या मैं कन्या के पाँव पूजे बिना तर पाऊंगा ? घर में कन्या न हो कोई बात नहीं | लेकिन सरसुती के होते हुए इस सुभाग से रह जाना अभाग ही तो है |’**घड़ी देखी तो तीन बजे थे | कुछ निश्चय करके रामलला कोठे में आए | अपनी संदूक खोली | लाल बनारसी साड़ी निकाली | साड़ी, सिंगार का सामान और जेवर जो पिछले कई साल में जुटाए थे, इकट्ठा कर झोले में भर लिए | जपी-जजमानी में जब भी बनारस जाना होता, रामलला सरसुती के ब्याह के नाम पर कुछ न कुछ जरूर खरीद लाते | पत्नी को बताने में संकोच होता था | एकबारगी सोचा कि बिना पत्नी को बताए अकेले
पाँव पूज आयें | लेकिन हिम्मत न हुई | इस पुन्न के काम से पत्नी और बच्चों को कैसे वंचित करते | झोला लेकर आँगन में आये और पत्नी को जगाते हुए कहा, “ अरी,चल, पाँव न पूजेगी बिटिया के ?”**“ क्या बुलौवा आ गया ? कौन आया था ? क्या लखन खुद आये थे ? ” एक ही सांस में रामलला की पत्नी पूँछ गयी**“ बिटिया के ब्याह में भी भला कोई बुलौवे की बाट जोहता है ? उठाओ सभी लड़कों को | नहीं पाँव पूजने को न मिलेगा |”**रामलला की पत्नी ने चुपचाप बात मान ली | लड़को को उठाने लगी | मन ही मन वह भी तो चाहती थी सरसुती के पाँव पूजने का सुभाग मिले | उसने सोचा, ‘बैर का क्या है, कल से फिर रख लेंगे लेकिन ये औसर फिर न आवेगा |’**रामलला ने पत्नी को झोला दिया, लड़कों को बर्तन-भाड़े दिए और आप चावल की बोरी सर पर रख गौशाला आये | बछिया की रस्सी खोली और लखन के द्वार पर जा पहुंचे |* *रामलला को द्वार पर देखते ही नात-रिश्तेदारों में चेतना आ गई थी | लखन के कान भरने वाले वाले पट्टीदार कहने लगे, “ हमनें तो कहा था लखन से | हमें एकबारगी न
बुलाओगे तो कोई बात नहीं | लेकिन भाई से न तोड़ो | भाई तो भाई है |”**रामलला कुछ न बोले | बछिया को बाहर बांधा और मंडप के नीचे आ पहुंचे | लखन ने रामलला और उनके परिवार को देखा तो भाई से लिपट गए | रोने लगे | क्षमा मांगने लगे | दोनों भाइयों की आँखों से अश्रुधारा बह निकली | लखन सुबकते थे | रामलला उनकी पीठ सहलाते | रामलला का लड़का लखन से माफ़ी मांगता हुआ बोला, “ हम ही अधरमी थे चाचा | हमारी ही गलती थी | हमसे ऐसा बड़ा अधरम हुआ कि हमने आप पर हाथ चला दिया |”**तीनों को भावनात्मक होते देख पूरे आँगन-मंडप के लोग भावुक हो गए थे | क्या बूढ़ी, क्या नई औरतें, सबकी आँखे भीग गयी थी |**“ हमें पाँव पूजना है” रामलला बोले**“ पाँव तो हम पूजेंगे, आप तो कन्यादान करोगे भैया ” लखन ने स्थिरता से कहा**“ मैं …”**“ बड़े भाई के बिटिया न हो और छोटा भाई कन्यादान करे, ऐसा भी कहीं होता है भला? “**लखन की बात सुनकर रामलला फूट पड़े | जोर- जोर से रोने लगे | मंगलमय वातावरण में अश्रुरूपी प्रेम की वर्षा हो रही थी |**रामलला के लड़कों ने काम- काज का मोर्चा सम्भाल लिया था | रामलला और उनकीपत्नी दोनों कन्यादान के लिए बैठे | गोदान का संकल्प किया | अपनी जमीन का चौथा हिस्सा सरस्वती के नाम संकल्प किया | रामलला ने अपना माथा जैसे ही सरसुती के पाँव पर रखा उनके दो अश्रु सरसुती के पीले पांवों से बह चले | लखन का रोना भी न रुकता था |**आज भाई-भाई के रिश्तों का खारापन अश्रुओं के साथ बाहर निकल आया था |*

*आज भाई-भाई के रिश्तों का खारापन अश्रुओं के साथ बाहर निकल आया था |*

–With warm regards,

Prahlad Kumar Pandey
Mob. 9425887606

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